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जन्मकुंडली में ग्रहों से बनने वाले दुर्योग…

जन्मकुंडली में ग्रहों से बनने वाले योग और दुर्योग…

यदि लग्न पर सूर्य मंगल की दृष्टि हो तो और उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो लग्न पर तो ऐसे जातकों को जानवर से भय हो सकता है या उससे नुकसान तक कि सम्भवना बन सकती है।।।

सूर्य के राशि मे चन्द्रमा और चन्द्रमा की राशि मे सूर्य बैठा हुआ हो तो ऐसा जातक अपने जिद ( हठ) के कारण स्वयं का नुकसान करता है।

यदि लग्न पर राहु की दृष्टि हो लग्नेश कमजोर हो तो इस योग को अच्छा नही कहा जा सकता यह जातक कष्ट प्रदान कर सकता है।

यदि लग्न से छठवे स्थान पर शुक्र हो तथा लग्न में मंगल हो तो जातक को नाक से सम्बंधित कोई समस्या सम्भवता हो सकती है।

शुक्र से युत शनि हो और गुरु से युत सूर्य हो उस पर अन्य किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो ऐसा जातक को पैर से सम्बंधित समस्याओ का सामना करना पड़ सकता है या उसे पैर में कोई समस्या रह सकती है।

लग्न से सप्तम भाव मे शनि ,सूर्य,राहु यह तीनों की युति हो तो ऐसे जातक को सर्पदंश का भय हो सकता है ।

जन्म के समय गुरु की राशि मे बुध और शनि के राशि मे मंगल हो तो ऐसे जातक को हिंसक जानवरो से नुकसान होने का भय बना रहता है यह 25 वर्ष के उम्र में अधिक संभावना रहती है।।।

शुक्र की राशि मे चन्द्रमा और और चन्द्रमा की राशि मे शनि हो तो ऐसे जातक को लोहे की चीज़ों से आघात होने का नुकसान होने का भय बना रहता है।।।

लग्न में मंगल हो उस पर शनि,राहु और सूर्य की दृष्टि हो तो पदक विच्छेद नामक योग होता है ।इस योग में स्थान पाकर भी अर्थात सफलता प्राप्त करने के पश्चात भी छूटने की संभावना बनी रहती है।।।

जिनके जन्म समय में मीन मेष और धनु इन्ही तीन स्थान में सभी ग्रह विराजमान हो तो ऐसे जातक के जीवन सुख में रहता है | उसे धन ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।।

यदि पाप ग्रह से रहित बृहस्पति केंद्र स्थान में हो तो जातक उदारता और सब गुणों का पात्र आदर सब कला को जानने वाला संगीत नृत्य जानने वाला सब जगह सम्मान प्राप्त करने वाला होता है ।।

जन्म समय मे लग्नेश बलि होकर केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो तो जातक सभी प्रकार को सुखों को प्राप्त करने वाला होता है।

जन्म कुंडली मे अकेला शुक्र यदि 11 भाव मे या केंद्र स्थान या त्रिकोण में हो तो ऐसा जातक विद्या,विज्ञान, के विषय मे जानकारी रखने

वाला,बहुत सम्माननीय कीर्तिमान दानी ,वीर,तथा सभी सुखों को प्राप्त करने वाला होता है।।।परन्तु इसमे लग्नेश का बलि होना भी आवश्यक है तथा शुक्र पर किसी पाप ग्रह की दृष्टि न हो शुक्र अपनी नीच राशि मे विराजमान न हो ।

सब योग में लग्नेश लग्न का विचार करना भी आवश्यक है

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