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12 भावों की चर्चा

जैसा कि हम जान चुके हैं। कि कुंडली में 12 घर होते हैं और प्रत्येक घर को अलग-अलग कार्य क्षेत्रों में बांटा गया है। महर्षि पाराशर जी के मतानुसार आज हम कुंडली के लग्न आदि द्वादश भाव की परिकल्पना को सीखते हैं।

१,(तनभाव) = जन्म समय में जिस लग्न का उदय होता है उसका देह के साथ उदय होने तथा शरीर पर उसकी किरण के प्रभाव के कारण तनु भाव नाम दिया गया है।

२,(धन भाव )= शरीर की प्राप्ति होने के बाद उस शरीर की रक्षा के लिए धन द्रव्य आदि की भावना हमारे हृदय में आती है। इसलिए दुसरे भाव को धन भाव नाम दिया गया है।

३(,पराक्रम भाव)= धन की प्राप्ति और रक्षा के लिए पराक्रम करना पड़ता है परिश्रम करना पड़ता है। तथा पराक्रम में सहायक और धन के विभाजक भाई होते हैं। इसलिए तीसरे भाव को पराक्रम और बंधु बांधव नाम दिया गया।

४,( सुख भाव) =पराक्रम प्राप्त होने पर घर माता-पिता आदि बंधुओं से हम सुख की भावना रखते हैं। इसलिए तीसरी भाव के बाद चौथा जो घर होता है उसे माता, भौतिक सुख का नाम दिया गया है।

५,( पुत्र भाव)= बंधु गृह सुख लाभ होने पर पुत्र प्राप्ति की भावना मन में आती है। अर्थात ब्रह्म ज्ञान परम सुखम, विषय सुख की अपेक्षा ब्रह्म ज्ञान परमसुख है। ब्रह्म ज्ञान विद्या से होता है।इसलिए चतुर्थ भाव के बाद पंचम भाव को पुत्र भाव और विद्या का नाम दिया गया है।

६,(रिपु भाव)= पुत्र प्राप्ति की कामना के बाद विवाह करने की कामना हृदय में आती है।परंतु रोगी शरीर को कोई भी कन्या नहीं देता है।अतः शरीर को रोग हीन बनाने की भावना भी हदय में आती है। अतः पंचम के बाद षष्टम भाव को रोग नाम दिया तथा रोग भी शत्रु का कारक होता है। इसलिए इस भाव का नाम शत्रु भी है।

७, (जाता भाव)= रोग से मुक्त होने पर स्त्री ग्रहण करने की भावना होती है। अतः सप्तम भाव को जाया भाव नाम दिया गया है।

८,(आयु भाव )=पत्नी प्राप्ति होने के बाद मृत्यु से बचने और आयु को बढ़ाने की भावना होती है। अतः अष्टम भाव को मृत्यु तथा आयु का नाम दिया गया।

९,( धर्म भाव )=आयु वृद्धि के लिए धर्म का आश्रय लेकर कार्य करना पड़ता है। तभी मृत्यु का निवारण व आयु वृद्धि होती है। नवम भाव को धर्म भाव नाम दिया गया।

१०,(कर्म भाव)= धर्म वृद्धि के लिए यज्ञ आदि कर्म करने पड़ते हैं। और कर्म करने के लिए राजा या पिता, का आश्रय लेना पड़ता है। इसलिए दशम भाव को कर्म राज्य नाम दिया गया ।

११,(आय भाव)=इस प्रकार पुन: कर्म संपन्नता के लिए धन लाभ की भावना होती है। इसलिए एकादश भाव को आय का भाव नाम दिया गया।

१२,( व्यय भाव )=लाभ होने के बाद उसका किस प्रकार व्यय होना चाहिए ऐसी भावना हृदय में आती है। अतः द्वादश भाव को व्यय भाव नाम दिया गया ।

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